गांव में कानून-नियम की जगह चली मनमानी, अर्थदंड और सामाजिक बहिष्कार से दहशत
दैनिक मूक पत्रिका सारंगढ़–बिलाईगढ़ – जिले के आदर्श ग्राम कैथा में इन दिनों हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि ग्रामीण इसे ‘तालिबानी फरमान’ कहकर बुलाने लगे हैं। गांव में न तो कानून की परवाह की जा रही है और न ही किसी सरकारी नियम की। जो कुछ चलता है, वह है कुछ प्रभावशाली लोगों का मनमाना फैसला—“जो कह दिया, वही अंतिम।”
जानकारी के अनुसार, नए पंचवर्षीय चुनाव के बाद गांव के कुछ पदाधिकारियों ने दबंगई दिखाना शुरू कर दिया। चुनावी रंजिश और कुछ लेन-देन के विवाद को लेकर ग्राम सभा में मनचाहे तरीके से भारी-भरकम अर्थदंड थोप दिए गए।
एक पूर्व पदाधिकारी को केवल दस्तखत न करने की वजह से 1,75,000 रुपये का अर्थदंड सुना दिया गया, जबकि दूसरे व्यक्ति पर 1,85,000 रुपये का दंड लगाया गया। दंड के भय और सामाजिक दबाव के चलते दोनों ने भारी रकम जमा भी कर दी।
इसी क्रम में गांव के पत्रकार दशरथ साहू पर भी अर्थदंड लगाने की तैयारी की गई और उनसे अमानत राशि तक रखवा ली गई। लेकिन जब पत्रकार ने इस “तालिबानी नियम” का विरोध किया, तो उन पर गांव के खान-पान, बात-चीत और लेन-देन तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
इतना ही नहीं, गांव में यह फरमान भी जारी किया गया कि यदि कोई ग्रामीण पत्रकार के चॉइस सेंटर में जाता है तो उसे 5,000 रुपये का अर्थदंड देना होगा। आरोप है कि ऐसे फरमान जारी करने वालों के घरों में पुलिसकर्मी होने से इनके हौसले और बुलंद हैं, और यह लोग किसी कानून या संविधान का डर नहीं रखते।
पीड़ितों ने इस पूरे प्रकरण की शिकायत बिलाईगढ़ थाना, छत्तीसगढ़ राज्यपाल, तथा मानव अधिकार आयोग में कर दी है।
इधर, स्थानीय पत्रकार द्वारा जब इस मामले को उजागर करते हुए खबर प्रकाशित की गई, तो दबंग पक्ष द्वारा सरपंच सहित पत्रकार पर खबर का खंडन करने का दबाव बनाया गया। हालांकि पत्रकार ने किसी भी तरह के खंडन से साफ इनकार कर दिया।
गांव में जारी इस प्रकार की मनमानी और सामूहिक दंड की घटनाओं से ग्रामीणों में भय और आक्रोश दोनों देखे जा रहे हैं। अब सभी की निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।
