मूक पत्रिका छत्तीसगढ़ – देश को आजाद हुए आठ दशक बीत चुके हैं, लेकिन आज भी सीवर की अंधेरी मौत भरी सुरंगों में मजदूरों को धकेला जा रहा है। सवाल सीधा है—क्या हम सच में आधुनिक भारत में जी रहे हैं या अब भी अमानवीय प्रथाओं के दौर में फंसे हुए हैं? सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद राजधानी के बड़े अस्पतालों, होटलों और अपार्टमेंट्स में खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
ताजा मामला रामकृष्णा केयर अस्पताल में सीवर सफाई के दौरान तीन मजदूरों की दर्दनाक मौत का है। यह कोई हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही और कानून के खुले उल्लंघन का जिंदा सबूत है। सवाल उठता है—जब मशीनों से सफाई अनिवार्य है, तो मजदूरों को मौत के मुंह में क्यों धकेला गया?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई केवल मशीनों से की जाए। हाथ से मैला उठाना और सीवर की सफाई कराना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद राजधानी में आज भी मजदूर बिना किसी सुरक्षा उपकरण के जहरीली गैसों के बीच उतरने को मजबूर हैं।
फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को कड़े निर्देश देते हुए कहा था कि सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों पर न्यूनतम 30 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। स्थायी दिव्यांगता पर 20 लाख और अन्य मामलों में 10 लाख तक की सहायता अनिवार्य की गई है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि न तो सुरक्षा है, न जिम्मेदारी तय हो रही है।
2013 का कानून और 2014 का ऐतिहासिक फैसला भी बेअसर
“हाथ से मैला ढोने वालों के रोजगार पर रोक और पुनर्वास अधिनियम 2013” स्पष्ट रूप से इस अमानवीय प्रथा पर रोक लगाता है। इसके बाद 2014 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले “सफाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत संघ” में कई महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए गए थे।
इनमें पीड़ित परिवारों को नकद सहायता, बच्चों को छात्रवृत्ति, आवास, कौशल प्रशिक्षण, मासिक वजीफा और सस्ती दरों पर ऋण जैसी सुविधाएं देने का प्रावधान है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
जिम्मेदार कौन? अस्पताल, ठेकेदार या प्रशासन?
रामकृष्णा केयर अस्पताल जैसी बड़ी संस्थाओं में अगर इस तरह की लापरवाही होती है, तो छोटे संस्थानों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। क्या इन संस्थानों पर कोई निगरानी है? क्या प्रशासन ने कभी जांच की कि सीवर सफाई किस तरह कराई जा रही है?
यह केवल एक अस्पताल का मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता है। ठेकेदार मजदूरों को बिना सुरक्षा उपकरण के काम पर लगाते हैं और हादसा होने पर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं।
अब भी नहीं चेते तो और कितनी मौतें?
हर बार हादसे के बाद मुआवजे की घोषणा कर दी जाती है, लेकिन असली सवाल यह है कि मौतें रोकी क्यों नहीं जा रही? क्या 30 लाख रुपये किसी की जिंदगी की कीमत हो सकती है?
जब तक जिम्मेदार अधिकारियों और संस्थानों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह मौत का सिलसिला जारी रहेगा। जरूरत है सख्त निगरानी, जवाबदेही तय करने और कानून का कड़ाई से पालन कराने की।
सीवर में उतरता हर मजदूर सिर्फ सफाई नहीं कर रहा, बल्कि अपनी जान जोखिम में डाल रहा है। अगर अब भी सिस्टम नहीं जागा, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि हत्या मानी जाएगी।
