रायपुर – छत्तीसगढ़ में “सुशासन” और “स्वदेशी मॉडल” के नाम पर शुरू की गई झेरिया ब्रांड पानी योजना अब भ्रष्टाचार की बदबू छोड़ती नजर आ रही है। जिस योजना का शुभारंभ स्वयं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने किया, उसी योजना में फर्जी एफएसएसएआई लाइसेंस, दोहरे दाम और कच्चे लेन-देन के जरिए करोड़ों रुपये की बंदरबांट के गंभीर आरोप सामने आए हैं।

पानी नहीं, खेल बिक रहा है!
नवा रायपुर के खंडवा–पचेड़ा जल शुद्धिकरण संयंत्र से शुरू हुई झेरिया ब्रांड पानी की बॉटलिंग को स्व-सहायता समूहों के सशक्तिकरण का मॉडल बताया गया था। लेकिन अब यही मॉडल अधिकारियों की जेब भरने का जरिया बनता दिख रहा है। झेरिया पानी की आपूर्ति शासकीय विभागों और ‘बिहान’ नेटवर्क में की जा रही है, जिसकी सीधी मॉनिटरिंग जिला पंचायत रायपुर के सीईओ और बीपीएम स्तर से होती है। ऐसे में अनियमितता “अनजाने” में हुई—यह तर्क खुद-ब-खुद सवालों के घेरे में है।
एक ब्रांड, दो एफएसएसएआई नंबर – आखिर क्यों?
जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं—
वैध एफएसएसएआई नंबर: 105250160000305
फर्जी/कूटरचित एफएसएसएआई नंबर: 106250160000306
सूत्रों का आरोप है कि फर्जी एफएसएसएआई नंबर वाले स्टीकर अलग से छपवाकर पानी की बॉटलिंग और खुले बाजार में सप्लाई की गई।

सबसे बड़ा सवाल—
अगर यह सिर्फ “प्रिंटिंग गलती” थी, तो दो अलग-अलग दाम क्यों?
₹20 बनाम ₹30: काले खेल की खुली कहानी
फर्जी एफएसएसएआई नंबर वाली बोतल: ₹20 प्रति लीटर
वैध एफएसएसएआई नंबर वाली बोतल: ₹30 प्रति लीटर
यानी साफ है कि सस्ती दर पर बिकने वाली बोतलों का पैसा सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं किया गया।
यहीं से जन्म लेता है वह सवाल, जिससे प्रशासन बचता नजर आ रहा है—
क्या यह “कच्चा हिसाब” नहीं है?
और क्या यह सीधा-सीधा सरकारी राजस्व की लूट नहीं?
अधिकारियों की सफाई या बचाव?
मामले में बीपीएम विक्रम लोधी और जिला पंचायत सीईओ कुमार बिश्वरंजन ने इसे महज़ “प्रिंटिंग त्रुटि” बताया है।
लेकिन सवाल यह है—क्या हजारों बोतलों पर गलत एफएसएसएआई नंबर छप जाना छोटी गलती है? क्या खाद्य सुरक्षा जैसे संवेदनशील मामले में बिना जांच सब माफ किया जा सकता है? और सबसे अहम—
अगर मीडिया सामने न लाता, तो क्या यह गलती कभी सुधरती?

सीईओ का बयान
“इस मामले की जानकारी आपके माध्यम से मिली है। यह मात्र प्रिंटिंग त्रुटि है। सुधार के निर्देश दिए जाएंगे। गलती की जिम्मेदारी मैं लेता हूं।”
— सीईओ, जिला पंचायत रायपुर

लेकिन जिम्मेदारी लेने से पहले यह भी स्पष्ट होना चाहिए— नुकसान की भरपाई कौन करेगा? दोषियों पर कार्रवाई कब होगी? अब निर्णायक मोड़ पर सरकार…यह मामला अब सिर्फ पानी की बोतल का नहीं रहा।
यह सवाल बन चुका है—
मुख्यमंत्री के नाम पर शुरू योजना में घोटाला हुआ या नहीं?
फर्जी एफएसएसएआई के तहत हुई बिक्री की जांच कौन करेगा?
क्या खाद्य सुरक्षा विभाग, आर्थिक अपराध शाखा या ईओडब्ल्यू जांच करेगी?
या फिर— मामला “प्रिंटिंग गलती” कहकर फाइलों में दफना दिया जाएगा?
छत्तीसगढ़ की जनता जवाब चाहती है।
सच छिपा तो नहीं रहेगा—यह तय है।
