मूक पत्रिका रायपुर – छत्तीसगढ़ में जब-जब देर रात आईएएस ट्रांसफर लिस्ट जारी होती है, तब-तब चर्चाओं का बाजार अपने आप गर्म हो जाता है। कोई इसे प्रशासनिक जरूरत बताता है, तो कोई इसे सत्ता की शतरंज। इस बार भी सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन लिस्ट में शामिल दो नाम ऐसे हैं, जिन्होंने इस ‘सामान्य’ को सीधे ‘असाधारण’ बना दिया।

कह सकते हैं कि यह मेहनत नहीं, बल्कि “प्रशासनिक कृपा” का उत्कृष्ट उदाहरण है — जहां उत्तर लिखने की जगह संपर्क लिखे जाते हैं।
पहला नाम: तीरथ राज अग्रवाल — घोटाले से गलियारे तक
अब आते हैं साहब पर, जिनकी चर्चा हमेशा रहती है — तीरथ राज अग्रवाल।

करीब 550 करोड़ रुपये के घोटाले में नाम आने के बाद, उनका आईएएस अवार्ड कुछ समय के लिए रुका था। आरोप गंभीर थे, फाइलें मोटी थीं और सवाल भी भारी। लेकिन कहते हैं न, जहां कनेक्शन मजबूत हो, वहां कलेक्शन की चिंता नहीं रहती।
सरगुजा कनेक्शन चला, सरकार ने साथ दिया और घोटाले की धूल खुद-ब-खुद साफ होती चली गई। कारण भी छोटा-मोटा नहीं — उनके ससुर हैं मंत्री राजेश अग्रवाल।
मंत्री ससुर, आईएएस दामाद और विभाग पूरा परिवार
मंत्रिमंडल विस्तार में सरगुजा अंचल से कई बड़े नाम पहले से मौजूद थे, फिर भी राजेश अग्रवाल को मंत्री बनाया गया और विभाग मिला — पर्यटन, संस्कृति और धर्मस्व। यह वही इलाका है, जहां अडानी समूह का साम्राज्य बेफिक्र चलता है। अमन-चैन की हवा बहती है, और उसी हवा में राजनीतिक पतंगें ऊंची उड़ती हैं। पहले तीरथ राज अग्रवाल वन मंत्री के ओएसडी थे। लेकिन जब ससुर खुद मंत्री हों, तो ओएसडी बने रहना कहां की समझदारी? सोच बदली, भूमिका बदली और ट्रांसफर सीधे धर्मस्व मंत्रालय में हो गया।

अब मंत्री नाम के, विभाग जमाई राजा के?
अब हालात यह हैं कि कल तक जो मंत्री के दामाद थे, वे अब ‘जमाई राजा’ बनने जा रहे हैं। चर्चा है कि कागजों में मंत्री राजेश अग्रवाल रहेंगे, लेकिन विभाग की असली कमान तीरथ राज अग्रवाल के हाथ होगी।
मतलब — धर्मस्व विभाग में तीरथ, तीर्थ यात्राएं भी तीरथ कराएंगे और उनसे मिलने वाला फल-आशीर्वाद भी… पूरी तरह पारिवारिक पैकेज में।
दूसरा नाम: सौमिल रंजन चौबे — बिना परीक्षा, सीधा पुरस्कार!
प्रशासनिक गलियारों में नाम सौमिल रंजन चौबे का है। चर्चा इसलिए नहीं कि उनका ट्रांसफर कहां हुआ, बल्कि इसलिए कि वे कैसे यहां तक पहुंचे। न छत्तीसगढ़ पीएससी, न यूपीएससी — कोई परीक्षा नहीं, फिर भी 15 सालों में ऐसी रफ्तार कि लंबी रेस के घोड़े भी शर्मा जाएं। देश में शायद यह पहला उदाहरण होगा, जब बिना परीक्षा दिए कोई ‘आईएएस अवार्ड’ की सीढ़ी चढ़ गया हो।

मायने व्यवस्था या व्यंग्य?
यह कहानी सिर्फ दो अधिकारियों की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जहां परीक्षा से ज्यादा प्रभाव, और जवाबदेही से ज्यादा रिश्ते मायने रखते हैं।
छत्तीसगढ़ की यह ट्रांसफर लिस्ट प्रशासनिक आदेश कम और व्यंग्यात्मक उपन्यास ज्यादा लगती है — जिसमें पात्र बदलते हैं, लेकिन कथा वही रहती है।
