दैनिक मूक पत्रिका जगदलपुर/बस्तर(पवन कुमार नाग) – सोचने वाली विषय यह है कि
ग्राम पंचायत करपावड के स्कुल में बचे 72 दो शिक्षक इसी मांग को लेकर
कलेक्टर कार्यालय में आवेदन प्रस्तुत कर अपर कलेक्टर से शिक्षक मांग कि थी लेकिन आईएस अधिकारी ने तो बिना पढ़े ही कहा ग्राम पंचायत का प्रस्ताव यहां नहीं चलेगा
कलेक्टर नहीं मिलने पर आवेदन
अपर कलेक्टर कार्यालय को आवेदन
प्रस्तुत किया गया था

कलेक्टर शिक्षा स्वास्थ्य पंचायत सामाजिक न्याय आदि कई विभागों के बीच तालमेल बनाना है वाणी मधुर होना चाहिए सम्मानजनक कार्य पूर्ण सरल न्याय पूर्ण होना चाहिए लेकिन
एक आईएएस ऑफिसर में नहीं है
करपावड सरपंच लखमू राम ने कहा कि अगर ग्राम पंचायत का प्रस्ताव
को मान्य नहीं दिया जाता है तो जनता की समस्याओं का समाधान कैसे होगा
भारत सरकार ने वर्ष 1996 में
पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, जिसे सामान्यतः पेसा कानून (PESA Act, 1996) कहा जाता है, लागू किया था। इसका उद्देश्य था कि अनुसूचित (आदिवासी) क्षेत्रों में ग्राम सभा और ग्राम पंचायत को अधिक अधिकार दिए जाएँ ताकि वहाँ के लोग अपनी परंपराओं, संस्कृति, संसाधनों और स्थानीय प्रशासन पर स्वयं नियंत्रण रख सकें।
छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर जिला सहित समस्त आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र इस अधिनियम के अंतर्गत आते हैं। यहाँ ग्राम सभा को यह अधिकार प्राप्त है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि, जल, वन, और रोजगार संबंधी निर्णयों में अपनी सहमति और सुझाव दे सके।
घटना का सारांश :

हाल ही में बस्तर जिले के एक आदिवासी बहुल ग्राम पंचायत ने अपने क्षेत्र के शैक्षणिक व्यवस्था या शिक्षक नियुक्ति / तबादले (या अन्य शिक्षा-संबंधी विषय) पर एक प्रस्ताव पारित किया।
यह प्रस्ताव पेसा कानून के अनुरूप ग्राम सभा की सामूहिक सहमति से पारित हुआ था, जिसे जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) अपर कलेक्टर कार्यालय को भेजा गया था ताकि उस पर आवश्यक कार्यवाही की जा सके।
परंतु, जिला शिक्षा अधिकारी ने उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया या उसे महत्व नहीं दिया, बल्कि कथित रूप से ग्राम पंचायत और ग्राम सभा के निर्णय को “अमान्य” या “असंगत” बताकर उसका अपमान किया। यह कार्यवाही पेसा कानून की भावना के विपरीत मानी जा रही है।
