मूक पत्रिका रायपुर – छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग इन दिनों ‘सूचना तंत्र’ से ज़्यादा स्थायी सत्ता के गढ़ के रूप में पहचाना जाने लगा है। विभाग में कुछ अधिकारी और कर्मचारी ऐसे हैं जो वर्षों से एक ही जगह मठाधीशों की तरह जमे हुए हैं। सरकारें बदलीं, मंत्री बदले, सचिव बदले—लेकिन इन अधिकारियों की कुर्सी जस की तस बनी रही।
सूत्र बताते हैं कि इन अफसरों पर न तो तबादले का नियम लागू होता है और न ही प्रशासनिक अनुशासन। हालत यह है कि ये अधिकारी फेवीक्विक की तरह कुर्सियों से चिपके हुए हैं। हैरानी की बात यह है कि प्रमोशन मिलने के बाद भी इन्हें फील्ड या अन्य विभागों में भेजने के बजाय जनसंपर्क भवन के भीतर ही एक कमरे से दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया जाता है।
प्रमोशन सिर्फ फाइलों में हुआ, ज़मीन पर नहीं।
न पदस्थापना बदली, न प्रभाव क्षेत्र।
लंबे समय से एक ही जगह टिके रहने का असर अब साफ दिखने लगा है। विभागीय कामकाज में जवाबदेही कमजोर हुई है और कुछ अधिकारी खुद को सिस्टम से ऊपर समझने लगे हैं। अंदरखाने यह संदेश आम हो चुका है—
“कोई हमारा कुछ नहीं कर सकता।”
सूचना यह भी है कि वर्षों की जमी पकड़ के चलते जनसंपर्क विभाग में एक तरह का ‘कुर्सी सिंडिकेट’ सक्रिय है, जहाँ पोस्टिंग, जिम्मेदारियाँ और प्रभाव सीमित हाथों में सिमटकर रह गए हैं। इससे न केवल युवा और नए अधिकारियों के अवसर प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि शासन की सूचना नीति भी सवालों के घेरे में है।
इन सबके बीच अगर कोई बदलाव नजर आता है, तो वह सिर्फ जनसंपर्क का सीपीआर (CPR)। चेहरे और पदनाम बदलते हैं, लेकिन असली नियंत्रण वही पुराना बना रहता हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या शासन इस जमी हुई व्यवस्था को तोड़ने का साहस दिखाएगा? या फिर जनसंपर्क विभाग यूँ ही कुछ “अछूत कुर्सियों” का सुरक्षित ठिकाना बना रहेगा?
