मूक पत्रिका छत्तीसगढ़ – जब कानून के दरवाजे बंद हो जाएं और पुलिस “आपसी मामला” कहकर पीड़ित को लौटा दे, तब इंसान आखिर जाए तो जाए कहां? रायगढ़ में यही सवाल खड़ा कर रहा है एक कोसा साड़ी व्यापारी, जिसने डेढ़ करोड़ रुपये की उधारी फंसने के बाद अब न्याय के लिए सड़क और मंदिर का रास्ता पकड़ लिया है।
कोसा साड़ी के थोक व्यापारी मनोज देवांगन देनदारों और मां काली की तस्वीरों से सजे रथ के साथ दंडवत यात्रा निकाल रहे हैं। परिवार सहित मंदिर-मंदिर जाकर वे सिर्फ भगवान से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से सवाल कर रहे हैं—“क्या ईमानदार व्यापारी के लिए न्याय की कोई जगह बची है?”
मनोज देवांगन पिछले 10–12 वर्षों से कोसा साड़ियों का व्यापार कर रहे हैं। करीब 100 व्यापारी उनसे उधार और नकद में माल लेकर मुनाफा कमा चुके हैं, लेकिन रायगढ़ के कुछ व्यापारियों ने करीब 1.5 करोड़ रुपये दबा लिए। न फोन उठाया जा रहा है, न पैसा लौटाने की मंशा दिखाई दे रही है।
पीड़ित व्यापारी का आरोप है कि जब उन्होंने पुलिस से गुहार लगाई तो एफआईआर तक दर्ज नहीं की गई। मामला “आपसी व्यापारिक विवाद” बताकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। सवाल यह है कि क्या करोड़ों की ठगी अब अपराध नहीं रही?
आर्थिक मार ने मनोज को अंदर से तोड़ दिया है। हाल ही में उनके पिता को हार्ट अटैक आया, लेकिन इलाज के लिए जब उन्होंने देनदारों से मदद मांगी, तब भी किसी का दिल नहीं पसीजा। ऊपर से बैंक लोन और ब्याज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
मनोज का कहना है कि मां काली के मंदिर में प्रार्थना के बाद उन्हें सपने में देवी के दर्शन हुए और उसी के बाद उन्होंने ‘कर नापने’ की परंपरा के तहत दंडवत यात्रा का संकल्प लिया—ताकि शायद आस्था वह न्याय दिला दे, जो व्यवस्था नहीं दे पाई।
बुधवार को पीड़ित व्यापारी परिवार सहित एसपी कार्यालय पहुंचा। पुलिस अधिकारियों ने जांच और देनदारों को बुलाने का आश्वासन जरूर दिया है, लेकिन सवाल अब भी कायम है— क्या यह भी सिर्फ एक आश्वासन बनकर रह जाएगा?
यह मामला सिर्फ एक व्यापारी का नहीं, बल्कि पूरे व्यापारिक समाज और कानून व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। रायगढ़ की सड़कों पर चल रही यह दंडवत यात्रा दरअसल सिस्टम की असफलता का मौन आरोपपत्र है।
