दैनिक मूक पत्रिका कबीरधाम – जिले में धान खरीदी व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। किसानों को उनकी मेहनत का सही मूल्य दिलाने के लिए बनाई गई पूरी प्रणाली अब भ्रष्टाचार का अड्डा बनती नजर आ रही है। ताजा खुलासे में तीन उपार्जन केंद्रों—बघर्रा, बाघामुड़ा और रमतला—में बड़े पैमाने पर धान घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। जांच और भौतिक सत्यापन में सामने आया है कि इन केंद्रों से कुल 4471.98 क्विंटल धान गायब है, जिसकी कीमत समर्थन मूल्य के आधार पर ₹1.06 करोड़ से अधिक आंकी गई है।
यह कोई साधारण गड़बड़ी नहीं, बल्कि एक संगठित और सुनियोजित आर्थिक अपराध है, जिसने न सिर्फ सरकारी खजाने को चूना लगाया है बल्कि किसानों के भरोसे को भी तोड़ दिया है।
कागजों में खरीदी, जमीन पर गायब धान
जांच में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह सामने आया कि तीनों केंद्रों में एक जैसा पैटर्न अपनाया गया। ऑनलाइन पोर्टल में धान खरीदी के पूरे रिकॉर्ड दर्ज हैं, किसानों के नाम पर भुगतान भी जारी कर दिया गया, लेकिन जब टीम ने मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन किया तो गोदामों में धान का कहीं नामोनिशान नहीं मिला।
यह साफ संकेत देता है कि सिस्टम के भीतर बैठकर फर्जी खरीदी दिखाकर सरकारी पैसा निकाला गया। हजारों क्विंटल का यह अंतर किसी तकनीकी गलती का परिणाम नहीं हो सकता, बल्कि यह सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की जड़ तक इशारा करता है।
बघर्रा: कागजों में धान, हकीकत में शून्य
बघर्रा उपार्जन केंद्र में 1251.18 क्विंटल धान की खरीदी रिकॉर्ड में दर्ज की गई थी। लेकिन जब जांच टीम पहुंची, तो वहां इतना धान मौजूद ही नहीं था। जांच में खुलासा हुआ कि ऑनलाइन एंट्री और स्टॉक रजिस्टर के बीच भारी अंतर है। कई एंट्रियां पूरी तरह फर्जी थीं, जिनका कोई भौतिक आधार नहीं मिला।
इस फर्जीवाड़े के जरिए करीब ₹29.64 लाख का भुगतान निकाल लिया गया। यानी किसानों के नाम पर सीधे सरकारी पैसा हड़प लिया गया।
बाघामुड़ा: 45 लाख का ‘सिस्टमेटिक’ खेल
बाघामुड़ा केंद्र में घोटाले का स्तर और बड़ा निकला। यहां 1929.20 क्विंटल धान की कमी पाई गई, जिसकी कीमत लगभग ₹45.70 लाख है। जांच में स्पष्ट हुआ कि खरीदी प्रभारी ने नियमों को दरकिनार करते हुए रिकॉर्ड में हेरफेर किया। ऑनलाइन डेटा और वास्तविक स्टॉक के बीच का अंतर यह साबित करता है कि यह कोई लापरवाही नहीं, बल्कि पूरी योजना के तहत किया गया भ्रष्टाचार है।

रमतला: 30 लाख का धान ‘गायब’
रमतला केंद्र में भी वही कहानी दोहराई गई। यहां 1291.60 क्विंटल धान का हिसाब नहीं मिला, जिसकी कीमत ₹30.60 लाख है। जांच में सामने आया कि पुराने स्टॉक को नया दिखाने और नए स्टॉक को छिपाने जैसे तरीके अपनाए गए। यह गड़बड़ी एक दिन में नहीं हुई, बल्कि लंबे समय से चल रहे एक नेटवर्क का हिस्सा लगती है।
मरका केंद्र में नया खेल — बोरो में पानी डालकर बढ़ाया वजन
घोटाले का दायरा यहीं खत्म नहीं होता। धान खरीदी केंद्र मरका में एक और चौंकाने वाला तरीका सामने आया है। यहां धान के बोरो में पानी डालकर उसका वजन बढ़ाया जा रहा था, ताकि ज्यादा मात्रा दिखाकर भुगतान हासिल किया जा सके। यह तरीका न सिर्फ सरकारी नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि यह किसानों के साथ सीधा धोखा भी है, क्योंकि इससे खरीदी की पारदर्शिता पूरी तरह खत्म हो जाती है।

किसानों के साथ सीधा विश्वासघात
धान खरीदी प्रणाली का मकसद किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य देना है। लेकिन जब इस तरह फर्जी खरीदी कर पैसा निकाला जाता है, तो इसका सीधा नुकसान उन किसानों को होता है जो ईमानदारी से अपनी फसल बेचते हैं। कई किसानों को भुगतान में देरी, खरीदी में बाधाएं और अनावश्यक प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यह घोटाला सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि किसानों के भरोसे के साथ बड़ा विश्वासघात है।
सिस्टम पर बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर घोटाला बिना अधिकारियों की मिलीभगत के कैसे संभव है? जांच रिपोर्ट में साफ उल्लेख है कि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों ने न सिर्फ अपनी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही की, बल्कि जानबूझकर नियमों को नजरअंदाज किया।
खरीदी प्रभारी, समिति प्रबंधक और अन्य कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है, जिससे यह मामला एक संगठित नेटवर्क की ओर इशारा करता है।
प्रशासन हरकत में, एफआईआर की सिफारिश
संयुक्त जांच टीम द्वारा रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद प्रशासन ने सख्त रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। खाद्य अधिकारी ने संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने, विभागीय कार्रवाई करने और घोटाले की राशि की वसूली की सिफारिश की है। इसके अलावा दोषी केंद्रों को ब्लैकलिस्ट करने और सख्त दंडात्मक कार्रवाई की बात भी कही गई है। मामले की सुनवाई कलेक्टर न्यायालय में शुरू हो चुकी है।
राजनीतिक हमला तेज, पूरी व्यवस्था पर उठे सवाल
इस घोटाले ने राजनीतिक हलकों में भी हलचल मचा दी है। युवा कांग्रेस के प्रदेश सचिव आकाश केशरवानी ने पूरे मामले को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने मांग की है कि जिले के सभी 108 उपार्जन केंद्रों की भौतिक सत्यापन रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, ताकि असली सच्चाई सामने आ सके।
उनका आरोप है कि आधे से ज्यादा केंद्रों में इसी तरह के करोड़ों के घोटाले की आशंका है और इसमें राइस मिलरों व अधिकारियों की मिलीभगत से धान का ‘रिसायकल खेल’ चलाया जा रहा है।
क्या यह सिर्फ तीन केंद्रों तक सीमित है? सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह मामला केवल तीन केंद्रों तक सीमित नहीं लगता। जिस तरह का पैटर्न सामने आया है, उससे यह साफ है कि यह एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। अगर पूरे जिले के सभी केंद्रों की निष्पक्ष जांच हो, तो घोटाले का आंकड़ा कई करोड़ तक पहुंच सकता है।
कबीरधाम का यह धान घोटाला सिर्फ एक वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का प्रतीक है। सवाल यह है कि क्या इस बार दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी पिछले घोटालों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा? जब तक पारदर्शिता, जवाबदेही और सख्त निगरानी नहीं होगी, तब तक किसानों के नाम पर चल रही यह लूट रुकने वाली नहीं है।
