मूक पत्रिका बिलासपुर – छत्तीसगढ़ में बिना मान्यता और बिना पंजीयन के संचालित हो रहे विद्यालयों का मुद्दा एक बार फिर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचा। WPPIL No. 22/2016 की सुनवाई सोमवार को माननीय मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं माननीय न्यायमूर्ति रवीन्द्र अग्रवाल की खंडपीठ के समक्ष हुई।
सुनवाई के दौरान इस मामले में हस्तक्षेपकर्ता (Intervenor in Person) विकास तिवारी स्वयं न्यायालय में उपस्थित हुए और शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act, 2009) की धारा 18 के कथित उल्लंघन का मुद्दा प्रमुखता से उठाया।

सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से न्यायालय को बताया गया कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 में शिक्षा का अधिकार (RTE) के तहत रिक्त सीटों को भरने के लिए विशेष प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सरकार ने जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं कि पात्र विद्यार्थियों से आवेदन आमंत्रित कर लॉटरी अथवा काउंसलिंग के माध्यम से प्रवेश प्रक्रिया पूरी की जाए। साथ ही निर्धारित समय-सीमा के भीतर सभी चयनित विद्यार्थियों की जानकारी RTE पोर्टल पर दर्ज करने के भी निर्देश दिए गए हैं।
हालांकि, हस्तक्षेपकर्ता विकास तिवारी ने न्यायालय के समक्ष यह महत्वपूर्ण तथ्य रखा कि राज्य में आज भी कई ऐसे विद्यालय संचालित हो रहे हैं, जिनके पास न तो वैध पंजीयन है और न ही आवश्यक मान्यता। उन्होंने तर्क दिया कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 18 स्पष्ट रूप से बिना मान्यता वाले विद्यालयों के संचालन पर रोक लगाती है, इसके बावजूद ऐसे संस्थानों का संचालन कानून की भावना के विपरीत जारी है।
विकास तिवारी ने अपने आवेदन के साथ संलग्न प्रमुख लोकायुक्त, छत्तीसगढ़ के आदेश का भी हवाला देते हुए न्यायालय का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि इस विषय पर पूर्व में भी गंभीर टिप्पणियां और निर्देश दिए जा चुके हैं। उनका कहना था कि यदि बिना मान्यता वाले विद्यालयों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई तो बच्चों के शिक्षा के अधिकार और उनके भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
सुनवाई के दौरान प्रतिवादी क्रमांक-51 की ओर से यह आपत्ति भी दर्ज कराई गई कि हस्तक्षेपकर्ता द्वारा दायर Rejoinder की प्रति उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई है। इस पर हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि हस्तक्षेपकर्ता संबंधित पक्ष को Rejoinder की प्रति उपलब्ध कराएं। साथ ही अन्य संबद्ध मामलों में भी सभी पक्षकार अपने-अपने दस्तावेजों और अभिलेखों का आपस में आदान-प्रदान सुनिश्चित करें, ताकि आगामी सुनवाई में सभी आवश्यक रिकॉर्ड न्यायालय के समक्ष उपलब्ध रहें।
खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 7 सितम्बर 2026 की तिथि निर्धारित की है।
सुनवाई के बाद हस्तक्षेपकर्ता विकास तिवारी ने कहा कि बच्चों के शिक्षा के अधिकार की रक्षा करना राज्य और प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि बिना मान्यता वाले विद्यालयों के खिलाफ कानून के अनुरूप प्रभावी कार्रवाई होना आवश्यक है। उनका कहना था कि यह मुद्दा अब न्यायालय के रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुका है और आगामी सुनवाई में वे उपलब्ध तथ्यों, दस्तावेजों एवं कानूनी प्रावधानों के आधार पर अपना पक्ष मजबूती से रखते रहेंगे।
इस मामले की अगली सुनवाई पर अब शिक्षा विभाग, बिना मान्यता वाले विद्यालयों के संचालन और RTE कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।
